तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई जमीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं |
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं |
तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू इक जलील-सी गाली से बेहतरीन नहीं |
तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्ही को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी है पर कमीन नही |
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक़ न कर
तू इस मशीन क पुर्ज़ा है,तू मशीन नहीं |
बहुत मशहूर है आएँ जरूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक तो है, हसीन नहीं |
जरा सा तौर-तरीकों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं |
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Jagte Raho Poem
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के लिये
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये !
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये
जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के लिये
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये !
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